गुरूकुल केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि संस्कार निर्माण की प्रयोगशाला
खेलेगा युवा तो जीतेगा भारत, खेलेंगे युवा तो खिलेंगे युवा

ऋषिकेश ( राव शहजाद ) । स्वामी नारायण गुरूकुल अहमदाबाद के तत्वावधान में आयोजित सद्विद्या ही समाधान कार्यक्रम की विदाई समारोह में परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती के पावन सान्निध्य ने उपस्थिति श्रद्धालुओं व युवाओं की चेतना में अमिट छाप छोड़कर इस समारोह को ऐतिहासिक बना दिया। लगभग 15 हजार श्रद्धालुओं से खचाखच भरे विशाल मैदान में यह कार्यक्रम शिक्षा, संस्कृति, सेवा, साधना, संस्कार और राष्ट्रभाव का विराट उत्सव बनकर उभरा।
स्वामी नारायण गुरूकुल के संतों ने अपने जीवन से जो मिसाल कायम की, वही आज समाज के लिए मसाल बन गई। सेवा-परायण महंतों और संतों की वाणी, आचरण और दृष्टि ने स्पष्ट कर दिया कि गुरूकुल केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि संस्कार निर्माण की प्रयोगशाला है। यहाँ शिक्षा प्रदर्शन नहीं, दर्शन है। यहाँ कला केवल मंच पर नहीं, बल्कि जीवन में उतरती है। स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने पूरे देश में गुरूकुल खोलने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि गुरूकुल दर्पण है, जिसमें सनातन संस्कृति का तेजस्वी प्रतिबिंब दिखाई देता है। गुरूकुल वह भूमि है जहाँ से चरित्र, चिंतन और चेतना का निर्माण होता है। आज जब अनेक युवा दिशाहीनता से जूझ रहे हैं, तब गुरूकुल ही वह दीप है जो अंधकार में मार्ग दिखा सकता है। इस कार्यक्रम को स्वामी ने पर्यावरण चेतना को भी गहराई से जोड़ा। स्वामी ने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि अपने और अपने परिवार के सदस्यों के जन्मदिवस पर पौधा लगाने का संकल्प लें। उन्होंने कहा कि यह केवल प्रकृति की सेवा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा उत्तरदायित्व है। देशभक्ति और देवभक्ति को एक सूत्र में पिरोते हुए स्वामी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “देव भक्ति और देश भक्ति दोनों साथ-साथ चलें, तभी राष्ट्र का उत्थान संभव है।” उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपने वतन, देश, संस्कृति और संस्कारों के लिए सदैव खड़े रहें, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों। गुरूकुल के एक युवा छात्र ने चिदानंद स्वामी को 1500 छोटे-छोटे डायमंड से निर्मित उनकी स्वप्रतिमा भेंट की। यह भेंट केवल कला का उदाहरण नहीं थी, बल्कि गुरु के प्रति श्रद्धा, समर्पण और संस्कारों की चमकदार अभिव्यक्ति थी। स्वामी ने उन्हें जीवन का मंत्र दिया कि स्पोर्ट्स, साइंस और स्पिरिचुअलिटी के साथ स्टडी, स्टडी और स्टडी।” उन्होंने कहा, “खेलेगा युवा तो जीतेगा भारत। खेलेंगे युवा तो खिलेंगे युवा।” यह नारा केवल शब्द नहीं, बल्कि भारत के उज्ज्वल भविष्य की रूपरेखा है। स्वामी चिदानंद ने युवाओं से कहा कि वे अपने संस्कारों का सम्मान करें, अपने मूल से जुड़ें, अपने मूल्यों से जुड़ें। उन्होंने जोर देकर कहा कि आधुनिकता अपनाएँ, पर अपनी आत्मा न खोएँ। तकनीक का उपयोग करें, पर विवेक के साथ। कहा कि विद्या हमें सोच देती है, और सोच से हमारे सितारे बदलते हैं, हमारी सृष्टि बदलती है। सोच बढ़िया तो जीवन बढ़िया। सकारात्मक सोच ही जीवन का समाधान है, और वह सोच मिलती है सद्विद्या से। सद्विद्या हमारे ऋषियों का वरदान है। उन्होंने एआई के युग में युवाओं को एक नया दृष्टिकोण दिया। कहा कि आज केवल आर्टिफिशियल इंटेलिजंेस ही नहीं, बल्कि आरआई, ऋषि इंटेलिजेंस, एस आई, सनातन इंटेलिजेंस और स्पिरिचुअलिटी इंटेलिजेंस की भी उतनी ही आवश्यकता है। तकनीक अगर ऋषि-बुद्धि और सनातन चेतना से जुड़ जाए, तो भारत, विश्व का पथप्रदर्शक फिर से बन सकता है।
वही माधवप्रियदास स्वामी ने कहा कि स्वामी चिदानन्द सरस्वती का अभिनन्दन करते हुये कहा कि “सद्विद्या ही समाधान” कार्यक्रम की यह विदाई दरअसल एक नई शुरुआत है, ऐसी शुरुआत जो शिक्षा को संस्कार से, ज्ञान को करुणा से और शक्ति को सेवा से जोड़ती है। यह कार्यक्रम हर श्रद्धालु, हर युवा और हर परिवार के मन में यह संकल्प छोड़ गया कि भारत का भविष्य सद्विद्या से ही सुरक्षित, सशक्त और समृद्ध होगा।

स्वामी ने स्वामी नारायण गुरूकुल के संत माधवप्रियदास स्वामी, पुरानी बालकृष्णदास स्वामी, श्री भक्त वत्सल स्वामी , श्री राम स्वामी , श्री हरेकृष्णा स्वामी , आचार्य रामप्रिय , अनेक पूज्य संत और गुरूकुल के सभी आचार्यो को धन्यवाद देते हुये कहा कि आपके अथक प्रयासों से गुरूकुल की दिव्य परम्परा स्वामी नारायण गुरूकुलों के माध्यम से उत्कृष्ट रूप से संचालित हो रही हैं। मौके पर जीतू , सोनाग्रा , अडानी ग्रुप से रमेश शाह सहित अन्य उपस्थित थे।








