महाशिवरात्रि के आध्यात्मिक रहस्य पर विशेष कार्यक्रम आयोजित

ऋषिकेश ( राव शहजाद ) । प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय, गीता नगर, ऋषिकेश केंद्र द्वारा महाशिवरात्रि का पावन पर्व 8 फ़रवरी को अत्यंत श्रद्धा, गरिमा और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। संस्था द्वारा इस दिवस को शिव जयंती के रूप में भी मनाया जाता है, क्योंकि यह दिन निराकार परमपिता शिव के अवतरण का स्मृति दिवस माना जाता है। इस पावन अवसर पर देहरादून से पधारी सब ज़ोन इंचार्ज बीके मंजू दीदी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति से कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे संतजन एवं विशिष्ट अतिथियों का भी स्नेहपूर्ण स्वागत किया गया। कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन संत रवि शास्त्री ( तुलसी मानस मन्दिर), स्वामी रामेश्वर गिरी महाराज( पंच दशनाम जूना अखाड़ा), स्वामी रघुवीर गिरी महाराज( निरंजन अखाड़ा) योगीराज योगी आशुतोष महाराज (आदि वैलनेस सेन्टर), स्वामी शिवानन्द महाराज, स्वामी आलोक हरिहर गिरी , शंभू पासवान (मेयर नगर निगम ऋषिकेश) एवं बी०के० मंजू दीदी, बी०के० मीना दीदी व ऋषिकेश केंद्र की प्रमुख संचालिका बी०के० आरती दीदी द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलन कर किया गया। दीप प्रज्वलन ने ज्ञान, शांति और आत्मिक जागृति का संदेश पूरे सभागार में प्रसारित किया। महंत रवि शास्त्री ने सर्वप्रथम तीनों पावन उत्सवों की सभी को हार्दिक बधाई दी। उन्होंने कहा कि हमें धर्म को कभी नहीं भूलना चाहिए, चाहे परिस्थितियाँ कितनी ही कठिन क्यों न हों, यहाँ तक कि यदि हमारी गर्दन तलवार के नीचे ही क्यों न हो। उन्होंने यह भी कहा कि हम दुर्भाग्यशाली हैं जो भौतिक वस्तुओं के मोह में घिरे हुए हैं, जबकि आप सभी सौभाग्यशाली हैं जो प्रतिदिन परमात्मा के सत्संग का लाभ प्राप्त करते हैं। क्योंकि अंत समय में साथ जाने वाली एकमात्र धरोहर परमात्मा का सुमिरन ही है। स्वामी शिवानंद महाराज ने अपने आशीर्वचनों में बताया कि संसार में कोई भी व्यक्ति दुःख नहीं माँगता, सिवाय माता कुंती के। सुख और दुःख दोनों ही नियति का हिस्सा हैं। परमात्मा हमसे दूर नहीं है, उसे देखने के लिए केवल अहंकार रूपी पर्दे को अपनी आँखों से हटाना आवश्यक है। बी०के० मंजू दीदी ने महाशिवरात्रि के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह पर्व आत्मा और परमात्मा के दिव्य मिलन की स्मृति दिलाता है। सभी को त्रिवेणी ( तीनो उत्सवों) की बधाई देते हुये कहा कि शिव कोई देहधारी देवता नहीं, बल्कि ज्योति बिंदु स्वरूप, सर्वशक्तिमान, निराकार परमपिता हैं, जो कलियुग के अंधकार में ज्ञान का प्रकाश देने अवतरित होते हैं क्योकि सबसे ज्यादा विकृत आज वयक्ति का मन है अगर हम एक अच्छी बात अपना ले तो मन शान्त व चरित्र उज्जवल हो जायेगा। हमारी चारो सोचो मे से ज्यादातर लोगो की वर्ष सोच रहती है। अगर हम सबको सुख देने का संकल्प ले तो सृष्टि देव तुल्य बन जायेगी, क्योकि हम सुखदाता के बच्चे सुखदेव है।योगीराज योगी अशुतोष महाराज ने अपने दिव्य उद्बोधन में कहा कि दिव्य कर्मों के सूक्ष्म तत्व, ऊर्जा शक्ति और सकारात्मक प्रकंपन किसी भी पावन आयोजन से लगभग सात दिन पूर्व ही वातावरण में उत्पन्न होने लगते हैं। इसी कारण शिवरात्रि का कार्यक्रम सात दिन पूर्व से ही मनाया जा रहा है, कहा कि यह संस्था डाकुओं को साधु और साधुओं को और ऊँचा उठाने का महान कार्य कर रही है। नए भवन की बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि इसके निर्माण में सभी का तन, मन और धन से योगदान रहा है। संगठन में अपार शक्ति होती है, और यह संस्था परिवारों को जोड़ने तथा उन्हें पवित्र बनाने का सतत कार्य कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि शत-प्रतिशत शुद्ध और सच्चे संकल्प सदैव पूर्ण होते है। इसके पश्चात बी०के० आरती दीदी ने सबको शुक्रिया देते शिवरात्रि के गहन आध्यात्मिक रहस्यों को सरल शब्दों में स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा आदि चढ़ाने का वास्तविक अर्थ बाहरी पूजा नहीं, बल्कि अपनी बुराइयों, विकारों और नकारात्मक संस्कारों का त्याग कर उन्हें परमात्मा को समर्पित करना है।

जल अर्पण करना मन की शुद्धता का प्रतीक है। दूध चढ़ाना पवित्रता और शांति का संकेत है। बेलपत्र चढ़ाना तीन गुणों पर विजय का प्रतीक है।
धतूरा अर्पित करना विष रूपी विकारों को त्यागने का संदेश देता है।
उन्होंने सभी को आह्वान किया कि सच्ची शिवरात्रि तभी है जब हम अपने जीवन में क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और ईर्ष्या जैसे दोषों का त्याग कर दिव्य गुणों को धारण करें।
कार्यक्रम का प्रभावशाली संचालन बी०के० सुशील भाई द्वारा किया गया। अंत में सभी उपस्थित 290 से अधिक भाई-बहनों ने राजयोग ध्यान का अभ्यास कर गहन शांति और आध्यात्मिक अनुभूति का अनुभव किया।




























