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उत्तराखंड में राजकीय लोकपर्व घोषित हो फूलदेई पर्व : डॉ राजे नेगी

ऋषिकेश ( राव शहजाद ) । उत्तराखंड की अनोखी लोक परंपरा का प्रतीक फूलदेई पर्व तीर्थनगरी सहित यहां से सटे ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक रीति रिवाज के साथ मनाया गया। जिसमें नन्हे-मुन्नें बच्चों ने हाथों में छोटी छोटी टोकरियाँ थामे घर- घर जाकर घर के आंगन में फूल बिखेरे। साथ ही प्रकृति से सुख-शांति और समृद्धि की प्रार्थना की।शनिवार को ऋषिकेश के हरिपुर कलां, रायवाला, श्यामपुर, छिद्दरवाला, गुमानीवाला, बापू ग्राम, मुनिकीरेती, ढालवाला आदि विभिन्न क्षेत्र में बच्चों ने तड़के उठते ही घरों की दहलीज पर रंग बिरंगे फूल डालकर सुख शांति की प्रार्थना की। उपहार स्वरूप घरों से लोगों ने उन्हें दाल-चावल और घोघा देवता की पूजा के लिए भेंट दी। बच्चों ने परंपराओं में रचे गीत फूलदेई.., छम्मा देई.., देनी द्वार भर भकार.., ये देहली ते बारम्बार नमस्कार.. गाते हुए घरों की संमृद्धि और खुशहाली की कामना की। अंतरराष्ट्रीय गढ़वाल महासभा के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. राजे सिंह नेगी ने बताया कि प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में चैत्र मास में मनाया जाने वाला फूलदेई पर्व प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है, फूलदेई संक्राति ऐसा उत्सव है, जिसमें बच्चे फ्योंली, बुरांश, आडू, खुमानी अन्य के फूलों को छोटी-छोटी रिंगाल की टोकरी में एक दिन पहले चुन कर लाते हैं। फूल संक्रांति के दिन बच्चे घर-घर घूमकर इसे आंगन में बिखेरते हैं। फूल की तरह मुस्कराते बच्चे फूल बिखेरते समय गीत भी गाते हैं। हर घर की महिलाएं बच्चों को अपने-अपने घरों से सौगात भी देती है। इसमें चावल, गुड़ और रुपये शामिल होते हैं। कहा कि फूलदेई संक्रांति हमारी परंपरा से जुड़ा त्योहार है।

हमे अपनी संस्कृति,सभ्यता और विरासत को सहेजने की जरूरत है। उन्होंने सभी लोगों से अपने लोक त्यौहार और परंपराओं का निर्वहन करने की अपील की है ।


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