श्रीरामलीला में सीता स्वयंवर और परशुराम-लक्ष्मण संवाद का भव्य मंचन

रायवाला । लोक कल्याण समिति के तत्वावधान में आयोजित पंचम श्रीरामलीला महोत्सव के पांचवें दिन चार प्रमुख दृश्यों का भव्य मंचन किया गया। इनमें फुलवारी, रावण-बाणासुर संवाद, धनुष यज्ञ तथा परशुराम-लक्ष्मण संवाद प्रमुख रहे। सभी दृश्यों का मंचन कलाकारों ने प्रभावशाली अभिनय के साथ किया, जिसे देखकर दर्शक भावविभोर हो उठे। श्रीरामलीला महोत्सव के मुख्य मंच उद्घोषक एवं लोक कल्याण समिति के प्रवक्ता विरेन्द्र नौटियाल (वीरू) ने जानकारी देते हुए बताया कि शनिवार की रात श्रीरामलीला में इन चारों दृश्यों का मंचन किया गया। फुलवारी प्रसंग ने मोहा मन
मंचन के दौरान दिखाया गया कि राजा जनक सभी राजाओं को आदरपूर्वक अपने महल में लेकर आए। अगले दिन सुबह भगवान श्रीराम और लक्ष्मण फूल लेने के लिए फुलवारी में गए। उसी समय राजा जनक की पुत्री सीता भी माता पार्वती की पूजा करने के लिए वहां पहुंचीं। फुलवारी में सीता की दृष्टि जब श्रीराम पर पड़ी, तो वे उन्हें एकटक निहारती रह गईं। श्रीराम भी सीता को देखकर आनंदित हुए। इस प्रसंग को श्रीरामचरितमानस की चौपाइयों के माध्यम से सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गय। इन चौपाइयों का भावार्थ है कि सीताजी की अनुपम शोभा देखकर श्रीराम को अत्यंत सुख प्राप्त हुआ। वे मन ही मन उनकी सुंदरता की सराहना करते रहे, लेकिन मुख से कुछ कह नहीं सके। ऐसा प्रतीत होता था, मानो ब्रह्माजी ने अपनी समस्त सृजन-कला को साकार रूप देकर संसार के सामने प्रस्तुत कर दिया हो। इसके बाद माता पार्वती की पूजा करते समय सीताजी ने श्रीराम को पति रूप में पाने की कामना की। धनुष यज्ञ में श्रीराम ने तोड़ा भगवान शिव का धनुष अगले दिन सीता स्वयंवर का आयोजन किया गया। स्वयंवर में शर्त रखी गई कि जो योद्धा भगवान शिव के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने में सफल होगा, उसी के साथ सीताजी का विवाह किया जाएगा। राजा जनक के आमंत्रण पर महर्षि विश्वामित्र भगवान श्रीराम और लक्ष्मण के साथ स्वयंवर में पहुंचे।
स्वयंवर में उपस्थित अनेक राजा भगवान शिव के विशाल धनुष को उठाने में असफल रहे। इसके बाद महर्षि विश्वामित्र की आज्ञा पाकर श्रीराम धनुष के समीप पहुंचे। उन्होंने सहजता से धनुष उठाया और उस पर प्रत्यंचा चढ़ाने लगे। इसी दौरान धनुष टूट गया और उसकी गूंज से स्वयंवर स्थल गूंज उठा। परशुराम-लक्ष्मण संवाद ने बांधे रखे दर्शक धनुष टूटने की आवाज सुनकर भगवान परशुराम स्वयंवर स्थल पर पहुंचे और धनुष तोड़ने वाले का नाम पूछने लगे। उनके क्रोध को देखकर सभा में सन्नाटा छा गया। इसके बाद परशुराम और लक्ष्मण के बीच तीखे वाक्-युद्ध का दृश्य प्रस्तुत किया गया। दोनों पात्रों के बीच हुए प्रभावशाली संवाद और कलाकारों के सजीव अभिनय ने दर्शकों को खूब मनोरंजन किया। परशुराम-लक्ष्मण संवाद का आनंद लेने के लिए देर रात तक बड़ी संख्या में रामभक्त और दर्शक मौजूद रहे। कलाकारों ने निभाए विभिन्न पात्र श्रीराम की भूमिका सौरभ चमोली, लक्ष्मण की चन्द्रमणी शर्मा, सीता प्रिन्स, राजा जनक की भूमिका राजेन्द्र रतूड़ी, सुनैना की भूमिका समर , सदानन्द की भूमिका राजेश जुगलान, व्यापारी की भूमिका गंगाधर गौड़, पार्थ, सूरज चमोली, विश्वामित्र की भूमिका नरेश थपलियाल, रावण सचिन गौड़, बाणासुर रमेश जोशी, परशुराम कमल देव जोशी, माली पवन आदि ने सुन्दर अभिनय किया । सभी कलाकारों ने अपने अभिनय से दर्शकों की खूब वाहवाही बटोरी।
इस दौरान नौटियाल ने बताया कि श्रीरामलीला महोत्सव में दिन रात कार्य करने वाले छोटे बच्चों एवं उनके अभिभावकों कों समिति द्वारा मंच में सम्मानित किया गया। समिति ने सभी नन्हे सेवाभावियों एवं उनके अभिभावकों के प्रति हृदय से आभार व्यक्त किया गया। प्रभु श्रीराम इन बच्चों को सदैव सेवा, संस्कार और सफलता के पथ पर अग्रसर रखें।

मौके पर लोक कल्याण समिति के अध्यक्ष गंगाधर गौड़, उपाध्यक्ष बालेन्द्र सिंह नेगी, सचिव नरेश थपलियाल, प्रवक्ता विरेन्द्र नटियाल , सदस्य राजेन्द्र प्रसाद रतूड़ी, नवीन चमोली, आशीष सेमवाल, मुख्य निर्देशक महेन्द्र राणा, राजेश जुगलान, राजेन्द्र प्रसाद कुकरेती, राजेन्द्र प्रसाद तिवाड़ी, राम सिंह, अनीता जुगलान, रुचि सती, रेखा थपलियाल, रेखा तिवाड़ी, रोहित सहित अन्य उपस्थित रहे।
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