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परमार्थ निकेतन पधारे भारत के 14 वें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद

परमाध्यक्ष चिदानन्द सरस्वती से हुई दिव्य भेंटवार्ता

ऋषिकेश ( राव शहजाद ) । परमार्थ निकेतन में भारत के 14वें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद परमार्थ निकेतन पहुँचे है। बता दे वह सविता कोविंद और बेटी स्वाति कोविंद परमार्थ निकेतन पधारे है । परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों ने पुष्पवर्षा, शंखध्वनि और वेदमंत्रों से अभिनन्दन किया। परमार्थ निकेतन की दिव्यता, शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत इस वातावरण में कोविंद का सपरिवार आगमन भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और सनातन मूल्यों के प्रति उनकी गहरी श्रद्धा और प्रतिबद्धता का जीवंत प्रमाण है।स्वामी चिदानन्द सरस्वती और रामनाथ कोविंद की भेंटवार्ता अत्यंत भावपूर्ण हुई। दोनों महान व्यक्तित्वों के बीच महात्मा गांधी के आदर्शों, भारतीय संस्कृति, मूल्यों व संस्कारों पर गहन चर्चा हुई। स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि रामनाथ कोविंद का जीवन स्वयं एक प्रेरणा है, एक साधारण ग्रामीण परिवेश से निकलकर भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक की यात्रा अत्यंत सादगी, समर्पण और मूल्यों से युक्त है। स्वामी चिदानंद ने कहा कि भारतीयता, केवल एक भूगोल नहीं, बल्कि एक भाव है, जिसमें विविधता में एकता, संस्कृति में श्रद्धा और जीवन में सह-अस्तित्व की भावना रची-बसी है। यह वह भूमि है जहाँ वेदों से लेकर स्वामी विवेकानन्द जी तक, राम जी से लेकर गांधी जी तक, हर विचार में मानवता का कल्याण समाहित है और सेवा तो भारतीय संस्कृति का मूल तत्व है। यहाँ जीवन को यज्ञ माना गया है, जिसमें दूसरों के लिए समर्पण ही आहुति है।

स्वामी चिदानंद ने कहा कि समरसता, वह चेतना है जो समाज के हर वर्ग, हर व्यक्ति को समान दृष्टि से देखने की प्रेरणा देती है। समरसता का अर्थ केवल समानता नहीं, बल्कि सम्मान के साथ सह-अस्तित्व है। महात्मा गांधी ने अपने रामराज्य के विचार में इसी समरसता की कल्पना की थीं ।पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा कि गांधी जी के लिए ‘रामराज्य’ केवल धार्मिक अवधारणा नहीं, बल्कि एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था थी, जिसमें कोई भूखा न हो, कोई शोषित न हो, और हर व्यक्ति को सम्मान, न्याय व अधिकार मिले। यह संकल्पना आज के युग में भी उतनी ही आवश्यक है, जितनी स्वतंत्रता संग्राम के समय थी। वही स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को रूद्राक्ष का पौधा भेंट कर अभिनंदन किया।

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